पहली बार हवाई जहाज चढ़ने का अहसास उसके दिल के अंदर के साथ उसके चेहरे पर भी साफ झलक रहा था। इकोनोमिक क्लास में भी सफर करते हुए उसे बिजनेस क्लास के नियमित यात्री से ज्यादा खुशी हो रही थी। शायद वह इस यात्रा को अपने जीवन के अब तक के सबसे खुशी पल के बारे में बताने वाला था। वह बहुत कुछ कहना चाहता था। बहुत कुछ बताना चाहता था।
और फिर.. यह क्या? उसने जैसे ही खिड़की से नीचे झांका, पूरी धरती उसे समतल दिखाई दे रही थी। गड्ढे व टीले सब समतल। जो थोड़ा ऊंचा लग रहा था वह था एक छोटी पहाड़ी। वह भी धीरे-धीरे ऊंचे जाने पर समतल हो गई। यह तो उसने कभी सोचा ही नहीं था।
अब वह बड़ा हो चुका था। ओहदा बड़ा, पैसे ज्यादा, लंबी गाड़ी, बड़ा बंगला और वह सब कुछ..। लेकिन उसने उस पहली हवाई यात्रा से सीख नहीं ली। वह छोटे और बड़ों के फर्क को नहीं मिटा पाया। जमीन पर उतरकर वह उसे और बड़ा करता रहा। सुबह गाड़ी सफाई करते ड्राइवर के साथ, तपती धूप में ट्रैफिक सिग्नल के पास खड़े किताब बेचते लड़कों के साथ और आफिस में आफिस स्टाफ्स के साथ।
आसमान में बैठा वह जो सभी को समतल देख रहा था बड़ा बनते ही फर्क करना सीख गया। यह वास्तविकता के करीब की कहानी है।